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जीवन में समाज का बहुत महत्व है , समाज से ही हमें  लोगों के बीच में किस प्रकार रहा जाता है | यह सब समाज से ही  हमें पता चलता है व्यावहारीक जीवन मे समाज के बहुत महत्व है |समाज से ही हमें उठना,बैठना,अपनों से बडों का सम्मान करना सिखाया जाता है  *वर्तमान समाज*:-  वर्तमान समाज आज बहुत ही बुराइयों से  ग्रस्त हो चुके हैं आज समाज उत्थान की बजाए  पतन की ओर जा रहे हैं समाज में आज सुधार करना बहुत आवश्यक है मार समाज  सुदृढ़ हो सके | आए जाने समाज में किस प्रकार सुधार कर सकते :-  सर्वप्रथम हमें समाज मे व्याप्त नशे को समाप्त करना होगा |इसके बाद हमे समाज मे व्याप्त कुरीतियों जेसे दहेज प्रथा ये समाज की सबसे बडी़ कुरीति है जिसको समाप्त करना बहुत आवश्यक है इस समय देखा जाए तो समाज सुधार का एक मात्र कार्य संत रामपाल जी महाराज कर रहे हैं | समाज सुधारक संत रामपाल जी महाराज  संत रामपाल जी महाराज ने अनेक समाज सुधार के कार्य किए हैं नशा  गुटखा तंबाकू शराब  मास आदि को खाना दूर की बात  छूना भी मना किया बहुत से लोगों को इन बुराइयों से दूर किया ...

बुढ़िया और वाजिद की कथा

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‘‘बुढि़या और बाजीद की कथा’’ एक समय बाजीद राजा राज्य-घर त्यागकर जंगल में साधना कर रहे थे। एक कुतिया ने 8 बच्चों को जन्म दिया। उसको बहुत भूख लगी थी। एक बुढि़या अपनी 4 रोटी कपड़े में बाँधकर खेत में काम के लिए जा रही थी। बाजीद ने कहा, माई! इस कुतिया को एक रोटी डाल दो। यह भूख से मरने वाली है। साथ में 8 बच्चे और मरेंगे। बुढि़या चतुर थी। उसने कहा कि मेरे खून-पसीने की कमाई है, यह कैसे दे दूँ? संत ने कहा कैसे रोटी डालोगी? बुढि़या ने कहा कि आप अपनी भक्ति का चौथा भाग मुझे दे दो, मैं रोटी डाल दूँगी। संत ने अपनी साधना का ( भाग संकल्प कर बुढि़या को दे दिया। वृद्धा ने एक रोटी कुतिया को डाल दी। फिर भी कुत्ती भूखी थी। करते-करते चारों रोटी कुतिया को डाल दी और संत बाजीद जी ने अपनी सर्व भक्ति कमाई वृद्धा को संकल्प कर दी जिससे कुतिया (सुनही) तथा उसके बच्चों का जीवन बचा। रोटी देने से माई को भक्ति की कमाई प्राप्त हुई और बाजीद जी भक्ति पुण्यहीन हो गया, परंतु कुतिया और उसके बच्चों को जीवन दान देने के कारण स्वर्ग प्राप्ति हुई। •••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••• आध्यात्मिक जानका...

तम्बाखु एक बुराई

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तंबाकू सेवन बहुत बुरी आदत है ,सभी संतों ने तम्बाखु को बहुत बुरी चीज बताया है  आइए जानते है तम्बाखु क्या है :- ‘‘तम्बाकू सेवन करना महापाप है’’ संत गरीबदास जी ने भक्त हरलाल जी से कहा कि आप (जो भी दीक्षा लेता है) तम्बाकू का (हुक्का, बीड़ी, सिगरेट, चिलम आदि में डालकर भी) कभी सेवन नहीं करना और अन्य नशीली वस्तुओं का प्रयोग न करना। भक्त ने कहा कि हे महाराज जी! तम्बाकू तो लगभग सब किसान पीते हैं। इसमें क्या हानि है? उत्तर :- संत गरीबदास जी ने बताया कि आपने रामायण तथा महाभारत की कथा तो सुनी होंगी। उसमें हुक्का सेवन का कहीं वर्णन नहीं है। तम्बाकू की उत्पत्ति बताऊँ कैसे हुई है, सुन! ‘‘तम्बाकू की उत्पत्ति कथा’’ एक ऋषि तथा एक राजा साढ़ू थे। एक दिन राजा की रानी ने अपनी बहन ऋषि की पत्नी के पास संदेश भेजा कि पूरा परिवार हमारे घर भोजन के लिए आऐं। मैं आपसे मिलना भी चाहती हूँ, बहुत याद आ रही है। अपनी बहन का संदेश ऋषि की पत्नी ने अपने पति से साझा किया तो ऋषि जी ने कहा कि साढ़ू से दोस्ती अच्छी नहीं होती। तेरी बहन वैभव का जीवन जी रही है। राजा को धन तथा राज्य की शक्ति का अहंकार होत...

समाज सुधारक संत रामपाल जी महाराज

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समाज सुधारक संत रामपाल जी महाराज  संत रामपाल जी महाराज ने अनेक समाज सुधार के कार्य किए हैं नशा  गुटखा तंबाकू शराब  मास आदि को खाना दूर की बात  छूना भी मना किया बहुत से लोगों को इन बुराइयों से दूर किया है संत रामपाल जी महाराज के जो भी अन्याय बनते हैं उनको पहली बार जो नियम दिया जाता है इसका पहला नियम यही है कि नशा नहीं करना है गुटका तंबाकू बीड़ी सिगरेट नहीं खाना है और ना इसमें किसी को सहयोग देना है तम्बाकू सेवन कितना पाप है ?  परमेश्वर कबीर जी ने बताया है :-- सुरापान मद्य मांसाहारी, गमन करै भोगै पर नारी। सत्तर जन्म कटत हैं शिशम्, साक्षी साहिब है जगदीशम्।। पर द्वारा स्त्रा का खोलै, सत्तर जन्म अन्धा हो डोलै। सौ नारी जारी करै, सुरापान सौ बार। एक चिलम हुक्का भरे, डूबै काली धार।। जैसे कि ऊपर वर्णन किया है कि एक बार शराब पीने वाला सत्तर जन्म कुत्ते का जीवन भोगता है। फिर मल-मूत्रा खाता-पीता फिरता है। परस्त्रा गमन करने वाला सत्तर जन्म अन्धे के भोगता है। मांस खाने वाला भी महाकष्ट का भागी होता है। उपरोक्त सर्व पाप सौ-2 बार करने वाले को जो पाप होता है। वह एक बार ...

भारत का पुनरुत्थान

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*पतन*   मनुष्य के पतन का मुख्य कारण यह नशा ,रिश्वतखोरी ,जुआ ,शराब, परस्त्री को बुरी नजर से देखना, मनमानी पूजा करना वेद, शास्त्रों का ना मानना |आध्यात्मिकता से दूर रहकर मनमानी पूजा करने से मनुष्य को भले बुरे का ज्ञान नहीं रहता है ,जिसके कारण मनुष्य गलत कार्य में संलिप्त रहता है | जिससे मनुष्य का पतन हो जाता है  हमारी संस्कृति पतन का कारण मनमाना आचरण ,नशा, आधुनिकता जैसे छोटे-छोटे बच्चों के जैसे कपड़े बड़ी स्त्रियों का पहनना यह भी एक तरफ से मानो मानव का पतन है क्योंकि ऐसे कपड़े पहनने से अश्लीलता समाज में फैलती है जिससे नौजवान पीढ़ी भ्रमित होती है और गलत कार्य कर देती है समाज को बिगाड़ने में प्रमुख कारण यह फिल्में हैं जिनमें अधिक से अधिक दर्शक को लुभाने के लिए ज्यादा से ज्यादा अश्लीलता दिखाई जाती है, जिससे नौजवान पीढ़ी जो है गर्त में जा रही है जिससे देश ही नहीं पूरे विश्व में गलत संदेश जाता है, वजह से पतन की ओर जा रहा है जिसको रोकने के लिए विशेष कदम उठाने आवश्यक है ||  पुनरुत्थान का अर्थ होता है- फिर से उठना/ पुन: उन्नति करना !  भारत के पुनरुत्थान के लिए हमार...

रोग(बिमारी)

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शारीरिक रोग शरीर या चित्त की वह स्थिति जिसके कारण संतप्त व्यक्ति को दर्द, दुष्क्रिया, तनाव की अनुभूति होती है, या जिनके संपर्क में आने पर व्यक्ति बीमारी का शिकार हो सकता है। कभी कभी व्यापक रूप से इस शब्द का प्रयोग चोट, विकलांगता, सिंड्रोम, संक्रमण, लक्षण, विचलक व्यवहार और संरचना एवं कार्य की विशिष्ट विविधताओं के लिए भी किया जाता है, जबकि अन्य संदर्भों में इन्हें विशेषणीय श्रेणियों में रखा जा सकता है। एक रोगजन या संक्रामक एजेंट एक जैविक एजेंट है, जिसके कारण इसके परपोषी को रोग या बीमारी होने की संभावना होती है। यात्री वायरस एक ऐसा वायरस होता है, जो किसी व्यक्ति के अंदर आसानी से फ़ैल जाती है या बीमारी या रोग को कोई लक्षण दिखाए बिना शरीर को संक्रमित कर देती है। भोजन से होने वाली बीमारी या भोजन विषाक्तता एक प्रकार की बीमारी है जो रोगजनक जीवाणु, जीव-विष, विषाणु, प्राइऑन या परजीवी से संदूषित भोजन के उपभोग के कारण होता है। विकासपरक दवा के अनुसार, बहुत सी बीमारियां सीधे संक्रमण या शरीर की दुष्क्रिया के कारण नहीं होती है, लेकिन यह भी शरीर द्वारा प्रदत्त एक प्रतिक्रिया है...

मांस खाना महापाप है

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मांस खाना महापाप है  जीव की हत्या कर उसका मांस खाना महापाप है ,परमात्मा ने हमारे लिए बहुत से खाने के लिए फलदार वृक्ष ,अन्न भण्डार दिये है  |जो हमारे खाने के लिए सर्वोत्तम आहार दिये है , फिर भी हम अगर परमात्मा के द्वारा बनाये गए जीवों को खाते हैं ,तो हमसे बडा़  परमात्मा का दोषी कोई  हो ही नहीं सकता | जो मनुष्य मांस खाता है ,वह परमात्मा का दोषी है |चाहे वह मुस्लिम हो या हिन्दू हो ,दोनों जीव परमात्मा के दोषी है |